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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा; गत्वा प्रशंसामभिधाय़ तेषाम् |  १५   क
वाक्यं यथावन्नृपतेः समग्र; मुवाच तान्स क्रमवित्क्रमेण ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति