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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
अय़ं च कामो द्रुपदस्य राज्ञो; हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः |  १९   क
यदर्जुनो वै पृथुदीर्घवाहु; र्धर्मेण विन्देत सुतां ममेति ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति