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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ; स्तस्मै प्रय़ोज्याभ्यधिकैव पूजा |  २१   क
भीमस्तथा तत्कृतवान्नरेन्द्र; तां चैव पूजां प्रतिसङ्गृहीत्वा ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति