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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं; पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य |  २७   क
न चापि तत्पातनमन्यथेह; कर्तुं विषह्यं भुवि मानवेन ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति