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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं व्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु; पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः |  २८   क
तत्राजगामाशु नरो द्वितीय़ो; निवेदय़िष्यन्निह सिद्धमन्नम् ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति