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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
असज्जमानश्च गतस्तरस्वी; वृतो द्विजाग्र्यैरभिपूज्यमानः |  ३   क
चक्राम वज्रीव दितेः सुतेषु; सर्वैश्च देवैरृषिभिश्च जुष्टः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति