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आदि पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततोऽपरः पार्थिवराजमध्ये; प्रवृद्धमारुज्य महीप्ररोहम् |  ५   क
प्रकालय़न्नेव स पार्थिवौघा; न्क्रुद्धोऽन्तकः प्राणभृतो यथैव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति