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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
मृगमहिषवराहसृमरगजाकीर्णेषु तपस्यन्तोऽनुसञ्चरन्ति |  १   क
धृतिपराः सत्त्वय़ोगाच्छरीराण्युद्वहन्ति ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति