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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
स स्वर्गसदृशो देशस्तत्र ह्युक्ताः शुभा गुणाः |  १०   क
काले मृत्युः प्रभवति स्पृशन्ति व्याधय़ो न च ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति