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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
न लोभः परदारेषु स्वदारनिरतो जनः |  ११   क
न चान्योन्यवधस्तत्र द्रव्येषु न च विस्मय़ः |  ११   ख
परोक्षधर्मो नैवास्ति सन्देहो नापि जाय़ते ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति