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शान्ति पर्व
अध्याय १०५
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भीष्म उवाच
अनाढ्याश्चापि जीवन्ति राज्यं चाप्यनुशासते |  २३   क
वुद्धिपौरुषसम्पन्नास्त्वय़ा तुल्याधिका जनाः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति