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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
प्राणधारणमात्रं तु केषाञ्चिदुपपद्यते |  १३   क
श्रमेण महता केचित्कुर्वन्ति प्राणधारणम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति