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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
एतानासेवते यस्तु तपस्तस्य प्रहीय़ते |  १८   क
यस्त्वेतान्नाचरेद्विद्वांस्तपस्तस्याभिवर्धते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति