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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
यस्त्वेतां निय़तश्चर्यां व्रह्मर्षिविहितां चरेत् |  २   क
स दहेदग्निवद्दोषाञ्जय़ेल्लोकांश्च दुर्जय़ान् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति