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शान्ति पर्व
अध्याय ३५०
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व्राह्मण उवाच
विवस्वतो गच्छति पर्ययेण; वोढुं भवांस्तं रथमेकचक्रम् |  १   क
आश्चर्यभूतं यदि तत्र किं चि; द्दृष्टं त्वय़ा शंसितुमर्हसि त्वम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति