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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
असत्कर्माणि कुर्वन्तस्तिर्यग्योनिषु चापरे |  २२   क
क्षीणाय़ुषस्तथैवान्ये नश्यन्ति पृथिवीतले ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति