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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
अन्योन्यभक्षणे सक्ता लोभमोहसमन्विताः |  २३   क
इहैव परिवर्तन्ते न ते यान्त्युत्तरां दिशम् ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति