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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
इत्युक्तोऽय़ं मय़ा धर्मः सङ्क्षेपाद्व्रह्मनिर्मितः |  २५   क
धर्माधर्मौ हि लोकस्य यो वै वेत्ति स वुद्धिमान् ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति