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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
परिव्राजकानां पुनराचारस्तद्यथा |  ३   क
ग्रामं वा नगरे पञ्चरात्रिका ग्रामैकरात्रिकाः |  ३   ख
कामक्रोधदर्पमोहलोभकार्पण्यदम्भपरिवादाभिमानहिंसानिवृत्ता इति ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति