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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
अभय़ं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा चरति यो मुनिः |  ४   क
न तस्य सर्वभूतेभ्यो भय़मुत्पद्यते क्वचित् ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति