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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
कृत्वाग्निहोत्रं स्वशरीरसंस्थं; शारीरमग्निं स्वमुखे जुहोति |  ५   क
यो भैक्षचर्योपगतैर्हविर्भि; श्चिताग्निनां स व्यतिय़ाति लोकान् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति