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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
मोक्षाश्रमं यः कुरुते यथोक्तं; शुचिः सुसङ्कल्पितवुद्धिय़ुक्तः |  ६   क
अनिन्धनं ज्योतिरिव प्रशान्तं; स व्रह्मलोकं श्रय़ते द्विजातिः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति