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वन पर्व
अध्याय १८५
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः स पाण्डवो भूय़ो मार्कण्डेय़मुवाच ह |  १   क
कथय़स्वेह चरितं मनोर्वैवस्वतस्य मे ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति