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शान्ति पर्व
अध्याय १४९
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जम्वुक उवाच
अनिर्वेदः सदा कार्यो निर्वेदाद्धि कुतः सुखम् |  ४७   क
प्रय़त्नात्प्राप्यते ह्यर्थः कस्माद्गच्छथ निर्दय़ाः ||  ४७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति