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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तत्र ववृधे राजन्मत्स्यः परमसत्कृतः |  १२   क
पुत्रवच्चाकरोत्तस्मिन्मनुर्भावं विशेषतः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति