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शल्य पर्व
अध्याय ६१
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सञ्जय़ उवाच
सोपासङ्गः सरश्मिश्च साश्वः सय़ुगवन्धुरः |  १४   क
भस्मीभूतोऽपतद्भूमौ रथो गाण्डीवधन्वनः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति