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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
उद्धृत्यालिञ्जरात्तस्मात्ततः स भगवान्मुनिः |  १५   क
तं मत्स्यमनय़द्वापीं महतीं स मनुस्तदा ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति