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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
द्विय़ोजनाय़ता वापी विस्तृता चापि योजनम् |  १७   क
तस्यां नासौ समभवन्मत्स्यो राजीवलोचन |  १७   ख
विचेष्टितुं वा कौन्तेय़ मत्स्यो वाप्यां विशां पते ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति