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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमुक्तो मनुर्मत्स्यमनय़द्भगवान्वशी |  १९   क
नदीं गङ्गां तत्र चैनं स्वय़ं प्राक्षिपदच्युतः ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति