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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
विवस्वतः सुतो राजन्परमर्षिः प्रतापवान् |  २   क
वभूव नरशार्दूल प्रजापतिसमद्युतिः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति