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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
गङ्गाय़ां हि न शक्नोमि वृहत्त्वाच्चेष्टितुं प्रभो |  २१   क
समुद्रं नय़ मामाशु प्रसीद भगवन्निति ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति