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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सुमहानपि मत्स्यः सन्स मनोर्मनसस्तदा |  २३   क
आसीद्यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखश्च वै ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति