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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
भगवन्कृता हि मे रक्षा त्वय़ा सर्वा विशेषतः |  २५   क
प्राप्तकालं तु यत्कार्यं त्वय़ा तच्छ्रूय़तां मम ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति