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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सम्प्रक्षालनकालोऽय़ं लोकानां समुपस्थितः |  २७   क
तस्मात्त्वां वोधय़ाम्यद्य यत्ते हितमनुत्तमम् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति