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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
तस्याप्यक्षसमा वाणा रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः |  १७   क
सोऽपि वीरो महावाहुर्यथैव स घटोत्कचः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति