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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवमेतत्त्वय़ा कार्यमापृष्टोऽसि व्रजाम्यहम् |  ३२   क
नातिशङ्क्यमिदं चापि वचनं ते ममाभिभो ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति