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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं करिष्य इति तं स मत्स्यं प्रत्यभाषत |  ३३   क
जग्मतुश्च यथाकाममनुज्ञाप्य परस्परम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति