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शल्य पर्व
अध्याय १६
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सञ्जय़ उवाच
तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवागतम् |  ८१   क
अथान्यं रथमास्थाय़ हार्दिक्योऽपि न्यवर्तत ||  ८१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति