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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं दृष्ट्वा मनुजेन्द्रेन्द्र मनुर्मत्स्यं जलार्णवे |  ३६   क
शृङ्गिणं तं यथोक्तेन रूपेणाद्रिमिवोच्छ्रितम् ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति