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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
संय़तस्तेन पाशेन मत्स्यः परपुरञ्जय़ |  ३८   क
वेगेन महता नावं प्राकर्षल्लवणाम्भसि ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति