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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
क्षोभ्यमाणा महावातैः सा नौस्तस्मिन्महोदधौ |  ४०   क
घूर्णते चपलेव स्त्री मत्ता परपुरञ्जय़ ||  ४०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति