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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
नैव भूमिर्न च दिशः प्रदिशो वा चकाशिरे |  ४१   क
सर्वमाम्भसमेवासीत्खं द्यौश्च नरपुङ्गव ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति