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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवम्भूते तदा लोके सङ्कुले भरतर्षभ |  ४२   क
अदृश्यन्त सप्तर्षय़ो मनुर्मत्स्यः सहैव ह ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति