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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एवं वहून्वर्षगणांस्तां नावं सोऽथ मत्स्यकः |  ४३   क
चकर्षातन्द्रितो राजंस्तस्मिन्सलिलसञ्चय़े ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति