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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अवाक्षिरास्तथा चापि नेत्रैरनिमिषैर्दृढम् |  ५   क
सोऽतप्यत तपो घोरं वर्षाणामय़ुतं तदा ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति