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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः |  ५१   क
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वय़म् |  ५१   ख
प्रमूढोऽभूत्प्रजासर्गे तपस्तेपे महत्ततः ||  ५१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति