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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे |  ५२   क
सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद्यथावद्भरतर्षभ ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति