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वन पर्व
अध्याय ७८
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वृहदश्व उवाच
अस्थिरत्वं च सञ्चिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा |  ११   क
तस्याय़े च व्यये चैव समाश्वसिहि मा शुचः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति