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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
तं कदाचित्तपस्यन्तमार्द्रचीरजटाधरम् |  ६   क
वीरिणीतीरमागम्य मत्स्यो वचनमव्रवीत् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति