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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
भगवन्क्षुद्रमत्स्योऽस्मि वलवद्भ्यो भय़ं मम |  ७   क
मत्स्येभ्यो हि ततो मां त्वं त्रातुमर्हसि सुव्रत ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति