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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
दुर्वलं वलवन्तो हि मत्स्यं मत्स्या विशेषतः |  ८   क
भक्षय़न्ति यथा वृत्तिर्विहिता नः सनातनी ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति